ऐसा क्यों होता है…

ऐसा क्यों होता है

चार दुकाने घूमने के बाद ख़रीदा अदरक छटाक भर,

घर आने पर, उसे धोने पर अहसास ये होता,

वो पांचवी दुकान जहाँ हम गए नहीं,

वहां का अदरक इससे अच्छा होगा।

-रुपाली

(यहाँ अदरक मेटाफोर या रूपक है )

खुशमिजाजी!

मेरे द्वारा खींची तस्वीर के लिए कुछ शब्द-

काम के तो न हम कल थे, न आज हैं।

खुशमिजाजी यूं ही तो बरकरार नहीं रहती।

-रुपाली

(ये तस्वीर मिनिमल (न्यूनतम – जिसमे आपका विषय कम से कम दिखयी दे )फोटोग्राफी दर्शाने के लिए खींची थी)

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नमी (moisture in eyes)

मेरे द्वारा खींची एक और तस्वीर के लिए कुछ शब्द –

जिंदगी में खुशियाँ कुछ कम नहीं,

पर आँखों की नमी है ज्यादा

-रुपाली

kavita_31july17

Fellow bloggers please help me translating it in English.

“बूँद” (Tiny raindrops)

मेरे द्वारा खींची एक और तस्वीर के लिए कुछ शब्द –

“बूँद”

उसकी याद में आसमां फट पड़ा
पूरी तरह खाली हो गया

सारी बातें, सारी कसमें बह गयी
बस यादों के कुछ पल शाखों पर और पत्तों पर ठहर गए

लेकिन कब तक…
-रुपाली

kavita_11july17

Free translation:

The rain poured heavily

to wash every sign of our togetherness.

A few moments are still hanging on leaves and branches

But until when…

Rupali

Hindi poetry: सकारात्मक रहें

रविवार के लिए विचार …
(शब्द और चित्र मेरे हैं )

जिंदगी के काफ़ी सारे बोझ
ज़रा सी देर के लिए होते हैं
हमारे विचारों की गर्मी और सही कोशिश
इन्हे पिघला देती है।

पर न जाने क्यों
हम इनकी तरफ पीठ किये
बरसों बरस निराशा की
ठंड में इन्हें उठाये जाते हैं।
-रुपाली

kavita_11june17

मैं, रसोई की खिड़की और चाँद

मेरे द्वारा खींची तस्वीर के लिए कुछ शब्द –
मैं, रसोई की खिड़की और चाँद

बड़े रौब से कहे कि तनहा है वो
रसोई की खिड़की से झाँक कर चाँद चुगली कर गया।
-रुपाली

kavita_04june17

शौक फरमाइए

लिखने की तमन्ना में सब इंतजामात किये

फिर कभी यहाँ तो कभी वहाँ बैठे,

ख़यालों के समंदर में रवानी थी काफी

लफ्ज़ों की कश्ती भी चलती रही बाकी,

लहरों की तरह ख़्याल टकराये

पर कसम ले लो, हम एक लफ्ज़ भी न उतार पाए,

कागज़ और कलम यूं ही पड़ी रही बेकार है

गर आप लिखने का  शौक  रखते हैं

तो बेझिझक आइये

कागज़ और कलम दोनों ले जाइये…

-रुपाली

Shayari: “कल और आज”

नए घर की देहलीज़ लाँघ रही बहू से सास ने कहा

बहू पीहर का सब बाहर ही छोड़ आना

भीतर न लाना

हमारे घर के अपने रिवाज़,

अपने तौर तरीके हैं .

झुकी नजरों से सास की एक हलकी सी झलक लेते हुए

बहू ने सोचा

कितने दिन/बरस लगे होंगे

इन्हें इस घर को अपना कहने में